भजन संहिता 84
1 हे सेनाओं के यहोवा, तेरे निवास क्या ही प्रिय हैं!
2 मेरा प्राण यहोवा के आँगनों की अभिलाषा करते-करते मूर्छित हो चला;
3 हे सेनाओं के यहोवा, हे मेरे राजा, और मेरे परमेश्वर, तेरी वेदियों में गौरैया ने अपना बसेरा
4 क्या ही धन्य हैं वे, जो तेरे भवन में रहते हैं;
5 क्या ही धन्य है वह मनुष्य, जो तुझ से शक्ति पाता है,
6 वे रोने की तराई में जाते हुए उसको सोतों का स्थान बनाते हैं;
7 वे बल पर बल पाते जाते हैं;
8 हे सेनाओं के परमेश्वर यहोवा, मेरी प्रार्थना सुन,
9 हे परमेश्वर, हे हमारी ढाल, दृष्टि कर;
10 क्योंकि तेरे आँगनों में एक दिन और कहीं के हजार दिन से उत्तम है।
11 क्योंकि यहोवा परमेश्वर सूर्य और ढाल है;
12 हे सेनाओं के यहोवा,
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